हार का बोझ है कंधों …

हार का बोझ है कंधों पर, पर सर झुका नहीं।…

कदम थक गए हो भले, पर जज़बा मरा नहीं।…

रात लंबी कुछ और है अभी, यह हम भी मानते है,….

पर अंधेरों से हार मान लूं, लहू इतना भी ठंडा नहीं।….

क़ुबूल हैं

वो खिज़ा में झड़ते पत्ते
वो नदी का सूखा जाना

वो जन्नत तक जाते रश्ते
वो साखों का झुक जाना

सब हमे क़ुबूल हैं

वो इश्क़ के तामीर छत्ते
वो परिंदे का वापस आना

वो काँधे में यादों के बस्ते
वो मंज़िल का मुकर जाना

सब हमे क़ुबूल हैं

वो सुकून के साथी फ़रिश्ते
वो नींदों को ख़्वाब का फुसलाना

वो अंगारों से दहकते रिश्ते
वो आंसुओं से शोले बुझाना

सब हमे क़ुबूल हैं

Asvony_Singh