गरीबों के पैरों के …

गरीबों के पैरों के छाले

इतिहास के पन्नों में दर्ज़ होगा
उनके पैरों के छालों का हिसाब।

गरीब की हाय और आँसुओं
से लिखी जाती हैं कुछ किताब।

राजनीति हूॅं मैं…

*राजनीति हूॅं मैं*?
पैसा दंगा फ़साद वोट बैंक चाहिए,
राजनीति हूँ मैं बस इतना समझ जाइए..!!

चुनाव में मेरे लिए खून पसीना बहाइए
पर दुख दर्द में कहीं ओर चले जाइए…!!

ना जाने ज़िंदगी के क…

ना जाने ज़िंदगी के किस मोड़ में हम भी अटक जायें!
इसलिए मुसीबत में पड़ों के लिए आवाज जरूर उठायें।

ये ज़रूरी नहीं जिसके पास पैसा है हर बार बच जायेगा!
वक़्त नहीं रहता सदा एक जैसा नजाने कब पलट जायेगा!

ज़िंदगी में ज़रूरत है जज़्बे की, काला अँधेरा छट जायेगा,
एक दूजे की मदद से संकट का दौर कभी तो कट जायेगा!

डाल कर साइकिल पर बच्…

डाल कर साइकिल पर बच्चों को कभी *थैलों* की तरह…

कभी उठा कर माॅं को कंधों पर *बोरी* की तरह…

कभी *लटक* कर ट्रक पर, कभी *लटका* कर बच्चों को,..

*जाना चाह रहा हूॅं मैं भी घर को आपकी तरह…*

ना *बस* मिली,ना *ट्रेन* मिली तो पकड़ ली रेल की पटरी…

ध्यान रखना मेरा *मेरी किस्मत, रौंध कर* फिर से न चल देना

किसी गाड़ी की तरह।

दास्ताँ गरीब की…

****दास्ताँ गरीब की****

देख रहे हैं इन दिनों हम सब
कुदरत का अजब नज़ारा
विचलित करता मन को ये
मातम भरा पसारा।

भूखे प्यासे लोग पैदल ही
घर जा रहे हैं
खाने को कुछ नहीं पास में
बिस्कुट ही खा रहे हैं।

बूढ़े,गर्भवती,बच्चे सब ही
पिसते जा रहे हैं
दिन रात चल चल कर
दुख बहुत पा रहे है।

कुछ सोते सोते मौत की
चपेट में आ गये है
विपदा के मारों के ऊपर
ट्रक ट्रेन चढा दिये हैं।

कोई ट्रकों में कोई ठेलों
में ठूँसें जा रहे हैं
कोई रिक्शे और साइकिल
से अकेले जा रहे हैं।

चारों तरफ़ से मार यह
गरीब खा रहे हैं
घर पहुँचना चाहते हैं पर
पहुँच नहीं पा रहे हैं।

काम धंधा पैसा रूपया
सब कुछ तो छूट गया
कुदरत का क़हर उन पर
काल बनके टूट गया।

मत रूलाओ इनको प्रभु
ये भी तेरे ही बंदे हैं
रहम करो तुम उन पर
काटो जो लिपटे फंदे हैं।

देख कर इनकी हालत
आँखें भर आती हैं
हाय! ग़रीबी तू कैसे दिन
निर्धनों को दिखाती है।?

#sAdLyLaViDavi?

सुनो ;अगर आपको आना ही नहीं था ?
तो बता दिया होता बरसों से हम आपका इंतजार ना करते⏱️
mERe alFaz ?
Anjali?

चौकीदार की जीवन ग…

चौकीदार की जीवन गाथा।
सारी रात गलियों के चक्कर वो लगाता है
एक हाथ में डंडा और सीटी भी बजाता है।

चलते चलते जब वह बहुत थक जाता है
गली में रखी कुर्सी के ऊपर बैठ जाता है।

रात के अंधेरे में जब सब लोग सो जाते है
रह जाता वो अकेला ये सब भूल जाते हैं।

कभी देखता तारे कभी चाँद को देखता है
क्या पायी है क़िस्मत कभी वो सोचता है।

कोई चोर ना घुस आये वो चौकन्ना रहता है
अपना फ़र्ज़ निभाने में पीछे नहीं रहता है।

कभी कभी सेहत उसकी नरम भी होती है
पर ड्यूटी तो ड्यूटी हैं उसे करनी होती है।

पढ़ा लिखा नहीं ज़्यादा चौकीदार बना है
पेट भरने के लिए बस यही रास्ता चुना है।

हर मौसम के क़िस्से उसके साथ जुड़े हैं
कुछ मीठे कुछ खट्टे और कुछ बहुत कड़े हैं।

कभी डाँट कभी प्यार, उतार चढ़ाव आते हैं
अपना डंडा सीटी लेकर रोज खड़े हो जाते हैं।

अपने भाग्य से कभी कोई लड़ नहीं सकता
वो चौकीदार है साहिब,वो छुट्टी नहीं सकता।

चीर देती है दिल को, …

चीर देती है दिल को,
ये तस्वीरें क्यों दिखाते हो…
कहाँ छुपे बैठे हो भगवन,
तरस इनपर क्यों नहीं खाते हो…
अन्न पैसा कुछ नहीं,
बस माँ बैठी है वो भी कंधे पर…
देख प्रभु तू देख कैसी,
मार है तेरी गरीब बंदो पर।???