ऐ वतन कित…

*?? ऐ वतन??*
कितना प्यारा देश है मेरा,क्यों आपस में लड़ते हैं,
सच्ची बात को कहने से, फिर हम क्यों इतना डरते हैं ।

विभिन्न धर्मों से सज़ा गुलिस्ताँ,कितना प्यारा लगता है,
खिले हुए फूलों की तरह दिल में सुकून सा भरता है ।

रंग बिरंगी वेशभूषा और विविध यहाँ की भाषा हैं,
लगता है खुद भगवान ने हाथों से मेरा वतन तराशा है।

कहीं नदी है कहीं पर्वत है और कहीं पर रेगिस्तान है,
कहीं मक्का कहीं बाजरा और कहीं पर खड़ा धान है।

कहीं भजन कहीं कीर्तन कहीं होता केरल और अजान है।
विविधता में एकता की झलक यही तो देश की जान है।

देश के विकास में हर धर्म के आदमी का पूरा योगदान है,
रक्षा हो या तकनीकी में सब ओर बढ़ा देश का मान है।

जानते हुए क्यों हम आपस में लड़कर मुद्दों को गड़ते है।
प्यारे वतन को क्यों हम ही लोग इस तरह शर्मसार करते हैं।