निर्भया

निकली थी घर से मैं
बनकर और सवर कर
थोड़ी सी लिपस्टिक लगाकर
थोड़ा सा इत्र छिड़क कर

बहुत खुश थी मै
मुस्का रही थी
मेरी खुशी मेरे चेहरे से
साफ नजर आ रही थी।

हां मिलने गई थी अपने प्रेमी से मैं
तो क्या गलत किया
हाथ ही तो पकड़ा था
कौन सा कोई जुर्म किया

घूर रहे थे ऐसे लोग
ना जाने क्या शर्मसार कर डाला हो
देख रहे थे ऐसे
जैसे किसी राह चलते को चूम डाला हो

खैर लोगों की तो आदत है
मैंने कोई परवाह नहीं की
हाथ उसका पकड़े ही रखा
बस स्टॉप से बस ली

जा रही थी बस से मैं
अपने प्रेमी के साथ
सपनों भरी दुनिया थी
थी तारों भरी रात

उस पर सोचा मैंने
काश हर लम्हा ऐसा हो
हर रात ऐसी ही कटे
और हर जन्म साथ ऐसा हो

सोचा ना था कभी
कुछ ऐसा भी हो जाएगा
टीवी पर सुना और देखा तो बहुत था
लेकिन क्या पता था मेरे संघ ही घट जाएगा।

खैर बैठी थी आराम से
उसके कंधे पर मेरा सर था
तभी अचानक कुछ लोग आए
और लगने लगा मुझे डर था

ना जाने उनको पास देख
कैसी बेचैनी होने लगी
सांसे मेरी उखड़ने लगी
और हर नब्ज सुन होने लगी

घबराते हुए मैंने
अपने प्रेमी का हाथ पकड़ा
कहीं कुछ बुरा ना हो जाए
मैंने उसको जोरो से जकड़ा

उनकी हैवानी आंखें मानो
जैसे मुझको नोच रही थी
मेरे शरीर के हर अंग को
नजरों में ही खरोच रही थी

उनके बढ़ते हाथों को देख
मैं घबरा रही थी
उनकी सांसों को शरीर से टकराते देख
मै सकपका रही थी।

पहली बार मुझे
उस औरत का दर्द महसूस हुआ
जिसकी इजाजत के बिना
किसी मर्द ने उसके बदन को छुआ

क्या हालत होती होगी उसकी
आज जान गई हूं मैं
उसके बिन मौत ही मर जाने का दर्द
पहचान गई हूं मैं

लेकिन अब ऐसा सोचने का
कोई वक्त ना था
आज मैं वही हूं
जहां कभी किसी और का दामन था

आ ही गया वह पल
जिसका मुझे डर था
मेरा कपकपाता हुआ बदन था
और उन दरिंदों का तन था

कोई चूमने लगा मुझे
कोई चाटने लगा
कोई मेरे विरोध पर
मुझ को डांटने लगा

प्रेमी मेरा खामोश नहीं था
मगर कुछ कर नहीं पा रहा था
कैसे बचाएं मेरी लाज वो
यह जान नहीं पा रहा था।

हाथ पर चला रहा था
लेकिन सब कुछ व्यर्थ था
मेरा प्रेमी तो इंसान था
उन दरिंदों पर कहां उसका बस था

मैं चीखी रोइ चिल्ला रही थी
हर मुमकिन कोशिश आजमा आ रही थी
लेकिन उनको रहम ना आया
मेरी जीभ को दांतो से बड़ी बे रहमी से दबाया।

धक्का दिया मैंने, लाते मारी
तब जाकर मैंने अपनी सांसे संभाली
चीखी फिर से चिल्लाई थी
बचा लो कोई गुहार लगाई थी

लेकिन चलती हुई बस थी
रात अंधेरी काली थी
कोई नहीं था आसपास
आज रात बवाली थी।

अब तो मेरा प्रियतम ही था
जो मेरी लाज बचा सकता था
उस काली घनेरी दुष्ट रात में
महाभारत कांड रचा सकता था

तब देखा उसको चीखी चिल्लाई
बोली उससे गुहार लगाई
देख तेरी जान को कोई तेरे सामने ही लूट रहा है
अरे कुछ तो कर बेशर्म लेटा क्यों है? मेरा भरोसा तुझपे टूट रहा है

इन बातों से उसमें आग जलाई
उसकी कसमें याद दिलाई
बोली तू तो रक्षक मेरा
आगे बढ़ कर सफाई

उसने फिरसे जान जुटाया
उसने अपना हाथ उठाय
लेकिन इससे क्या होना था
उसको मारा फेक गिराया

फेख दिया था उसको बाहर
किसी सामान की तरह
दम घोट रही थी मेरी हर उम्मीद
उसी काली रात की तरह

लेकिन तब भी मैंने पूरी तरह
खुद पर भरोसा नहीं तोड़ा
लड़ती रही में अंत तक
मैने खुद को उनके हवाले नहीं छोड़ा

फाड़ रहे थे वो मेरे कपडे
किसी कागज की तरह
नोच रहे थे मेरा अंग अंग
किसी भूँके बाज़ की तरह

जो सम्भाली थी अपने दामन से मैने
वा आबरू आज उघड़ी हुई थी
किसी का मूह मेरे सीने पे था
किसी की उंगलिया मेरी जाँघो के बीच घडी हुई थी

सिसक रही थी मैं
सुबक रही थी मैं
अपने सीने को हाथो से ढकने की कोशिश
कर रही थी मैं

लेकिन क्या करती मैं
क्या क्या छुपाती
बे लीबास पड़ी थी
क्या क्या बचाती

कोई अंग ऐसा ना था शरीर का
जिसको उसने रगड़ा ना हो
कोई ऐसा बाल ना था सर का
जिसको उसने जकड़ा ना हो

दर्द बता रही हूं मैं अपना
कही तू रो ना देना
उन दरिन्दो की हैवानियत जान
कही अपना आपा तू खो मत देना

क्या क्या हुआ मेरे साथ
आज साफ-साफ बताती हूं मैं
जाने तू भी बलात्कार का दर्द
दर्द से रूबरू कराती हूं मैं

सुन किसी का हाथ मेरे सीने पर था
किसी की जीभ थे नाभि पर
किसी का मूह था जाँघो बीच
किसी का पौरुष रगड़ता छाती पर

तब भी लड़ रही थी मैं
उनसे झगड़ रही थी मैं
अपने नाखूनों से – दातों से
उनको जख्मी कर रही थी मैं

लेकिन मेरा कोई जतन
मेरे किसी काम ना आया
उन दरिंदों ने रोड , कांच की बोतल और ना जाने क्या क्या
मेरे गुप्त अंगो में चीर घुसाया

और क्या क्या हुआ मेरे साथ
किन लफ्जों में बताऊ
ना तुम सुन पाओगे
ना मैं बोल पाऊ

कुछ लाल-लाल फैला था चारों और
शायद मेरा खून था
लेकिन तब भी जो ना थमा था
उन दरिंदों पर चढ़ा हवस का जुनून था

हारी तो नहीं थी तब भी मैं
लेकिन सहा नहीं जा रहा था
हिम्मत तो अभी भी बहुत थी
लेकिन कुछ करा नहीं जा रहा था

उनकी हैवानियत के आगे
मेरे हौसले फीके पड़ गए
अब मैं करूंगा मैं करूंगा
मुझपे सब एक साथ ही झपट गए।

छोड़ो नहीं मुझको उन्होंने
मेरी बेहोशी के बाद भी
बुझा रहे थे हवस अपनी
मुझ पर एक साथ ही

जब मन भर गया थक गया
मुझको भी बाहर फेंक दिया
बेहोश बे लिबास पड़ी थी मैं
देखा बहुतो ने , किसी ने साथ ना दिया

कुछ लोगों ने तो मुझे
उन्हें हैवानो से भी ज्यादा दर्द दिया
किसी ने चद्दर तक नहीं उड़ाई
और मुझे कैमरों में कैद किया

जानती हूं मैं, मेरी दास्तान पढ़कर
तेरी आंखें नम है
लेकिन दुख इस बात का है
तेरा आक्रोष अभी भी कम है

आज भी सब जगह
यही सब हो रहा है
इंसान इंसान कहां रहा
दरिंदा हो रहा है

मर के भी मेरी आत्मा
मुक्त ना हो पाई
उस बेआबरू होती लड़की बच्ची औरत की चीखे
मुझे देती है सुनाई

कहां जाऊं मैं
किसको बोलूं
हैवान इतने
किस-किसको रोकू

अपने घरों तक में वो
दर्द में चिल्लाती है
जब किसी अपने के हाथों ही
उसकी इज्जत लूटी जाती है

भिगोती है आँचल वो अपना
चुपके से रोती है
उसकी आत्मा भी अब
उसके संग नहीं होती है

एक बच्ची जो मां शब्द का
मतलब भी नहीं जानती
एक बच्ची जो अभी खुद को
संभाल तक नहीं पाती

वह मां बन जाती है आज
बच्चे को दूध पिलाती है
उसकी बेबसी मातृत्व में कही
खो सी जाती है

हां खैर छोड़ो
तुम्हें कोई मतलब नहीं है इस बात से
तुम्हारी मां बेटी बहने अभी तक महफूज है
तुम्हारे साथ में

लेकिन सोचो
अगर कुछ ऐसा ही हो जाए उनके साथ में
तो क्या तब भी हाथों पर हाथ रख कर बैठोगे
ऐसे हालात में?

अरे सुनो

सब कहते है,
बहुत देखे है तेरे जैसे,
जरा मैं भी तो देखूं,
आखिर दिखते कैसे है मेरे जैसे।

❤️Aaradhya❤️

कहानी

कहानी को किरदार की अब जरूरत नहीं,

दस्तूर बेअदब है फ़जीहत को शब्दों को इजाजत नहीं।

क़ुबूल हैं

वो खिज़ा में झड़ते पत्ते
वो नदी का सूखा जाना

वो जन्नत तक जाते रश्ते
वो साखों का झुक जाना

सब हमे क़ुबूल हैं

वो इश्क़ के तामीर छत्ते
वो परिंदे का वापस आना

वो काँधे में यादों के बस्ते
वो मंज़िल का मुकर जाना

सब हमे क़ुबूल हैं

वो सुकून के साथी फ़रिश्ते
वो नींदों को ख़्वाब का फुसलाना

वो अंगारों से दहकते रिश्ते
वो आंसुओं से शोले बुझाना

सब हमे क़ुबूल हैं

Asvony_Singh