कोरोना का टास्क न…

कोरोना का टास्क

न कंधे पर सिर न, हाथों में हाथ!

दो गज की दूरी और मुँह पर मास्क?

ना पूरा किया टास्क

  याद रखिए...

ज़िन्दगी से धोएगें हाथ…

महामारी लगी थी

घरों को भाग लिए थे सभी मज़दूर, कारीगर.
मशीनें बंद होने लग गई थीं शहर की सारी
उन्हीं से हाथ पाओं चलते रहते थे
वर्ना ज़िन्दगी तो गाँव ही में बो के आए थे.

वो एकड़ और दो एकड़ ज़मीं, और पांच एकड़
कटाई और बुआई सब वहीं तो थी
ज्वारी, धान, मक्की, बाजरे सब.
वो बँटवारे, चचेरे और ममेरे भाइयों से
फ़साद नाले पे, परनालों पे झगड़े
लठैत अपने, कभी उनके.

वो नानी, दादी और दादू के मुक़दमे.
सगाई, शादियाँ, खलियान,
सूखा, बाढ़, हर बार आसमाँ बरसे न बरसे.

मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है.
यहाँ तो जिस्म ला कर प्लग लगाए थे !

निकालें प्लग सभी ने,
‘ चलो अब घर चलें ‘ – और चल दिये सब,
मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है !

[English Translation by Rakhshanda Jalil]
Migrants, COVID-19
The pandemic raged

The workers and labourers fled to their homes
All the machines ground to a halt in the cities
Only their hands and feet moved
Their lives they had planted back in the villages

The sowing and the harvesting was all back there
Of the jowar, wheat, corn, bajra – all of it
Those divisions with the cousins and brothers
Those fights at the canals and waterways
The strongmen, hired sometimes from their side and sometimes from this

The lawsuits dating back to grandparents and grand uncles
Engagements, marriages, fields
Drought, flood, the fear: will the skies rain or not?

They will go to die there – where there is life
Here, they have only brought their bodies and plugged them in!

They pulled out the plugs
‘Come, let’s go home’ – and they set off
They will go to die there – where there is life.

हिचकियों से कह…

??

हिचकियों से कह दो

ज़रा कुछ दिन सब्र बांध लें

ये जो दूरियां हैं…..

फिलहाल सब के लिए ज़रूरी हैं….!!!
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