यह ज़िंदगी कितनी ख़…

यह ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत है
न जाने क्यों इसको मुश्किल बनाया है।
बिना ज़रूरत की चीजों को भरकर,
जाने क्यों घर में कबाड़ सजाया है।

पलभर की खबर नहीं है किसी को,
कब यहाँ से ऊपर को उड़ जाना है।
फिर क्यों रात दिन दौड़े जा रहे हैं,
जब सब कुछ यहीं पर रह जाना है।

बुरी नहीं है सुखी जीवन की कामना,
पर उसकी भी कोई तय सीमा तो हो।
जिस सुख के लिए हम सबकुछ भूल गए
उस सुख के लिए उम्र का बीमा तो हो।

पत्थरों के घर सजाना मक़सद नहीं है,
इसमें ख़ुशियों के रंग भरना भी तो है।
कितनी उम्र है कोई जानता नहीं ये तो,
इसलिए जमकर मस्ती करना भी तो है।

बहुत कुछ पड़ा है क़ुदरत की गोद में,
इसका भी आनंद लेना बनता तो है।
कितनी बोझिल सी हो गई है ज़िंदगी,
इसे हल्का करने का मन करता तो है।

ज़रूरत के हिसाब से जियें ये ज़िंदगी,
ये विचार दिमाग़ में आज भर आया है।
सोचे तो ये ज़िंदगी कितनी सरल है,
न जाने क्यों इसको मुश्किल बनाया है।

वक़्त

वक़्त किसी का मोहताज नही होता ⏱बाते किसी की सच्ची जरूर होती है किसी की दशा देख कर उसे मापो मत क्योंकि वक़्त की अदालत से कोई बचता नहीं है आज किसी का है तो कल किसी और का होगा⌚❣