ए वक्त तू क्यों भाग…

*ए वक्त तू क्यों भागा जा रहा है*
मुझ पर तरस क्यों नहीं खा रहा है।

पहले ताक़त थी तेरे संग भागने की,
पर देख ना अब मुझे बुढ़ापा आ रहा है।

तू नहीं थकता इस कदर दौड़ते दौड़ते,
दिन और रात की कड़ियाँ जोड़ते-जोड़ते।

आ बैठ ना मेरे पास कुछ देर ठहर जा,
मेरे बचपन का वो वक़्त फिर से दिखा।

तुझे तो याद होगा वो बीता सारा समां,
अल्हड़ बचपन बेफिक्र जवानी का लम्हा।

तू हर रोज़ कैसै जवान होता जा रहा है?
*ए वक्त तू क्यों भागा जा रहा है*