बेआबरू होकर निकले उस…

बेआबरू होकर निकले उसकी गली से जब उसने कहा:-

ये शरीफ़ों का मोहल्ला है क्यों आवारों की तरह घूमें जा रहे हो,

कमाने की उम्र में क्यों मजनू बनकर गलियों में धक्के खा रहे हो।

मैं छोटा सा दीया …

*मैं छोटा सा दीया*
जलना मेरा काम है।
रातें करता रोशन,
दीया मेरा नाम है।

अँधेरी रातों को,
मैं रोशन बनाता हूँ।
खुद ही जलकर
अँधेरे को मिटाता हूँ।

दोस्त हूँ मैं सबका
सबको राह दिखाता हूँ।
दूसरों को करो रोशन,
ये सबक़ सिखाता हूँ।

आँधी हो या बारिश ,
मैं नहीं घबराता हूँ।
निडर बने रहने का,
पाठ भी पढ़ाता हूँ।

अपनी अहमियत को,
मैं कभी न जताता हूँ।
अँधेरी रातों में सबकी
आँखें बन जाता हूँ।

खुद को मिटाकर,
लौ को जलाता हूँ।
सुख हो या दुख हो,
जलना मेरा आम है,

* मैं छोटा सा दीया*
*जलना मेरा काम है।*

शोहरत‍️ सोचा ज़…

?शोहरत?‍♀️
सोचा ज़माने को आज अपनी ख़ूबियाँ गिनवा दूँ,
ज़मीर बोला रूक जीत तुझे हक़ीक़त से मिलवा दूँ।
अपनी ख़ूबियाँ भी भला कोई बताता है,
ऐसा करने में उसका केवल अहम नज़र आता है।
अनंत सिप्पीयों से भरा है सागर, लेकिन हर किसी सिप्पी में न मोती बन पाता है।
जिनमें होती है हक़ीक़त में ख़ूबियाँ ,रब उनको ख़ुद चमकाता है,
नहीं पड़ती गिनवाने की ज़रूरत ,ज़माना उनको ख़ुद पलकों पर बिठाता है।
देखने में शोहरत बहुत अच्छी लगती है, रास्ते में उसके दुविधा भी पड़ती है,
इस दुविधा का नाम है अहंकार, जो शोहरत के साथ ही बढ़ती है।
हे जीत तू क्यों बिना ख़ूबियों के ख़ूबियाँ गिनवाने में लगी है,
अहम की अग्नि में खुद को जलाने लगी है।
संतोषी होने की तेरी आदत ही तो मुझे पसंद है,
क्यों उसको शोहरत की आग में जलाने लगी है।