परमपुरुष

वह पुरुष…जो बार-बार आकर
तुम्हारे मन की वीणा को
झंकृत कर जाता है
तुम्हारी कल्पनाओं के
आकाश में मदमस्त
मादक बादल -सा मंडराता है
कभी…स्वप्न में आकर
अपने पवित्र प्रेम के निर्झर में
तुम्हें स्नान कराता है
और कभी अचानक…
तुम्हारी कलाई पकड़कर
तुम्हारे अंग-संग होने का
अहसास कराता है
लेकिन….तुम्हें भय है ज़माने का ,
कि कहीं गलत न समझ ले तुम्हें  
तुममें..मीरा-सी दीवानगी नहीं
राधा-सा साहस नहीं
जमाने के तानों का विष
केवल मीरा ही पी सकती है
प्रेम में..सब कुछ गँवाने का साहस 
राधा ही कर सकती है
मीरा ही..प्रेम के नशे में झूमकर
गा सकती है ,नाच सकती है
राधा की तड़प में ही
वह साहस है…जो कह सके
कि वह कोई परपुरुष नहीं
   केवल वही पुरुष है
     “परमपुरुष” है

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