पनाह

मै गिरोह में पनपता रहा ,
मंज़िल की तलाश में ,
बेखबर रैन बसेरा बना लिया मजार पे,
मैं हर मुश्किल घड़ी को बदलता रहा मुस्कुरा के ,
बिचारा मन ही इतना प्यारा था या किस्मत ही बेखबर हो रही थी ,
मैं फिर हवाओं से पता कभी पूछ लेता था ,
तो हो जाता दीदार था ,
संजोग रहा या फिर रहा किस्मत का खेल बेवजह ही भटकते रहती ये समझौते की दीवारें

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