मन की आकांक्षा

आज राग-विहाग मैं मन का
बयां करुं कविता में,
लहरें‌ हैं राग सुनाती
उफनाई हर सरिता में।
इस जीवन का राग
समझ न मेरी आया,
आखिर मैंने इस जग में
‌ क्युं है जीवन पाया,
ज्यों बूंद आसमां में
हवा में उड़ती आती,
गिरकर इन लहरों में
अपना अस्तित्व गंवाती,
वैसे ही अपना जीवन
खो गया कहीं इस जग में,
लहरें हैं राग…

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