नमन

कर दो वासव का वज्र भंग
ले लो  उदयागिरि को उछंग
मोड़ो सुरसरि की प्रबल धार
कंपित हो अरि का अंग अंग

क्यों करते हो क्रन्दन अपार
तुम हो गीता के स्वयं सार
ज्यों हिमगिरि के स्तंभ अटल
जोड़ो सरगम के खण्ड तार

सींचो सिकता के कण अनन्त
जिसकी पुकार हो दिग दिगन्त
जो पाँव शिथिल हो रुकें नहीं
नापे हिमगिरि का आदि अंत

जिनकी रचना के भाव भृंग
शब्दों से  छूकर  हृदय श्रृंग
सागर  में उठ जाते हिलोर
भरते जन जन के मन तरंग

दिनकर सी आभा है अपार
भावों मे जिसके है ख़ुमार
क्या उनको भेद सके कोई
जो नीलकंठ सम गरल धार

जज़्बात चढ़ाते व्योम-हार
कर रही कलम कागज श्रृंगार
अनुभूति व्याप्त जिसकी त्रिलोक
कर रहे नमन हम कोटि बार

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