आदत तुम्हारी..

तुम खता करके भी
ख़ामोश रहो
मैं बेगुनाही की भी
मांग लूं माफी
कुछ अजीब नहीं लगती
तुम्हें यह ज़िद तुम्हारी ?
तुम शर्तो के घेरे में
कैद कर दो मुझे
मै बेशर्त मगर हर बात
मान लूं तुम्हारी
कुछ अजीब नहीं लगती
तुम्हें यह जरूरत तुम्हारी ?

तुम नज़रअंदाज़ कर दो
मेरी हर ख्वाइश
मैं पूरी करती रहूं मगर
हर ज़िद भी तुम्हारी
कुछ अजीब नहीं लगती
तुम्हें यह नीयत तुम्हारी ?

तुम कोशिश भी न करो
मुझे मनाने की
मैं रूठ कर भी मगर
मनाती रहूं तुम्हे ही
कुछ अजीब नहीं लगती
तुम्हें यह हठ तुम्हारी ?

तुम बढ़ते रहो नित
नये रास्तो पर
मैं ठहरी रहूं बस
उसी मोड़ पर
कुछ अजीब नहीं लगती
तुम्हें यह चाल तुम्हारी ?

तुम बदलो कितना ही
रंग, चेहरा अपना
मैं चाहती रहूं सदा
एक जैसा तुम्हें
कुछ अजीब नहीं लगती
तुम्हें यह उम्मीद तुम्हारी ?

तुम न पढ़ो न समझो
कोई सवाल मेरे
मै तुम्हारी खामोशी में ही
ढ़ूढ़ती रहूं जवाब अपने
कुछ अजीब नहीं लगती
तुम्हें यह आदत तुम्हारी ?

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