हम अपने आज क़े सुख…

हम अपने “आज” क़े सुख को आनेवाले कल की बली वेदी पर चढ़ाते रहतेहैँ
लेकिन सुख तो सदैव वर्तमान क्षणमे ही होता है

मन सदैव लंगर डाल कर स्थाबद्दरहताहै
शायद इसीलिए कभीभी वो न मुक्त होता है न लचीला होता है

प्रेम करना याने सभी चीजों का अनुभव करनाहै
प्रेमशून्यता का अर्थ ही व्यर्थ का जीना होता है

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