सनम

न तुझसे कोई खुशी
न तुझसे कोई गम
बीत गए वह दिन
जब आशिक तेरे थे हम
अब न मैं तेरा जानू
न ही तू मेरी सनम
हो जाऊंगा दूर
जहां ले जाए करम
मैंने तुझको अपना समझा
हर घड़ी हरदम
पर तेरी मैं समझ न आया
जैसे कोई भरम
न तुझसे अब कोई खुशी
न तुझसे कोई गम…

             कवि: श्रवण चौधरी"राही"

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