बचपन के ज़माने ✍️🤼🚴⛹️

वो बचपन के दिन, वो बचपन की बातें,
वो बचपन के सपनें, वो बचपन की रातें
कितने रूहाने थें, वो दिन भी कितने सुहाने थें।
पटरी से गुजरती रेल को देखना,
वो रेलगाड़ी का छुक छुक सुनना,
हवाई जहाज़ को देख खुश हो जाना,
फिर उसको बाय बाय एरोप्लेन कहना।
वो नई किताबों का मिलना,
ज्योमेट्री बॉक्स को पेन पेंसिल से सजाते थे।
नई किताबों पर खाकी कवर चढ़ाना,
फिर उस पर नेम टैग चिपकाना।
सुबह अचानक पेट में दर्द का उठना,
स्कूल ना जाने का कोई नया बहाना बनाते थे।
छाता लेकर स्कूल जाना लेकिन फिर भी भीग कर आना,
बारिश में भीग कर आते थें और मम्मी की डांट भी खाते थें।
होमवर्क ना होने पर टीचर को
बिजली चले जाने का कारण देना।
वो रंग-बिरंगे टिफिन के डब्बें
वो मिल्टन की पानी की बॉटल
टिफिन में रोज़ परांठा और सब्जी खा कर खुश हो जाते थे
मिल्टन की बॉटल का ठंडा पानी पीकर ठंडे हो जाते थे।
स्कूल के गेट पर 25 पैसे की आधी कटी मूली का लेना
उस पर फिर मसाला और नींबू का रस लगवाना,
कितना चटपटा और खट्टा खाते थे,
सर्दी में देर से उठने पर,दौड़ कर स्कूल जाते थे।
छोले कुलचे भी खाते थे और
बर्फ़ के गोले खाने से होंठ रंग भी जातें थें,
लाइट चले जाने पर कितने खुश हो जाते थे,
कैंडल लाइट में जल्दी से होमवर्क खत्म कर,
फिर बाहर इकट्ठे हो जाते थे।
वो साइकिल पर दौड़ कर चढ़ना
चलती साइकिल से फिर नीचे उतरना।
वो पेड़ों पर झूले झूलना,झूलते झूलते फिर खड़े हो जाना
ऊपर से फिर छलांग लगाते थें
कितना स्टंट दिखाते थें,खतरों के खिलाड़ी बन जाते थें।
वो सर्दी की रातें, वो गर्मी की छुट्टियां,
वो बचपन के दिन, वो स्कूल के ज़माने
कितने रूहाने थें, वो दिन भी कितने सुहाने थें।

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