चारदिन मिले थे जिं…

चारदिन मिले थे जिंदगी क़े
दो आकांक्षाओं मे बीत गये
दो उनकी पूर्तीकी प्रतिक्षा मे
न तो कभी कुछ पूरा होता.
न कहीं पहुंचते हैँ
और जीवन व्यर्थता मे बीत जाता है

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