प्रकृति के हिचकोले

आज बादल बरसे हैं
गर्मी के नखरे उतरे हैं
देख धरा का सुर्ख रंग
मन में सतरंगी सपने बरसे हैं
ज्यों ज्यों झड़ी लगती गई
चाहत की अग्नि सुलगती गई
अभी तक बाहर‌ गर्मी थी
अब भीतर सुलगे शोले हैं
कभी ना भ्रमित इनसे होना
तेरे सपनों में‌ कोई‌‌ रंग नहीं
यह प्रकृति के हिचकोले हैं।

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