लबालब भरे बैठे रहोगे…

लबालब भरे बैठे रहोगे
बस अपनी ही कहते रहोगे
तो एक बूंद भी और
ना संभाल पाओगे

कुछ अहम गिरा पाओगे
कुछ वहम सुखा पाओगे
तो ही ये बहते दरिया समेट
ज्ञान समंदर बन पाओगे

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