जिन्दगी की खुशियों क…

जिन्दगी की खुशियों को तलाशते तलाशते….
कब मैंने खुद को तराश डाला ।।
कब मैं आम इंसान से एक ख़ास बन बैठी….!!
ख़ुद भी जिससे थी अनजान,
खुशियों का सफ़र ना था आसान…!!

डग डग भटकती रही मैं खुद को ढूंढती रही….
कभी इस डगर कभी उस डगर…!!
कभी आइने में ढूंढी अपने अक्श को…
कभी अपनों से पूछा खुद को…!!
हर सफ़र की थी कहानी अधूरी….
चलना था फिर भी मंज़िल अभी थी दूर…!!

खुद को तराशने का काम यूं ही गुजरता रहा….
आंखों में कभी गम कभी आंसू लिऐ….!!
उम्मीदों का काफ़िला यूं ही चलता रहा….
जिंदगी की खुशियों को तलाशते तलाशते….
कब मैंने खुद को तराश डाला ।।
कब मैं आम इंसान से एक खास बन बैठी…!!

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