स्त्री हूं मैं …!!…

स्त्री हूं मैं …!!

हर रिश्ते ईमानदारी से निभाती
मां, बहन , बीवी , भाभी, बेटी
रिश्तों की डोर हाथों में थामे
हर रिश्तों में ख़ुद को ढाले…

लोगों के तानों को हंस कर सह जाती
सारे अरमानों को तख़ पर रख
जीती दूसरों के उसूलों पर
फिर भी ख़ुश रहतीं हैं
क्युकी स्त्री हूं मैं….!!

ख़ुद के लिए जीना क्या होता है
शादी के समय मायके में ही छोड़ आती
पति बच्चों परिवार की बागडोर संभालने में
ख़ुद के व्यक्तित्व को भी भूल जाती
सब के सपनों को ख़ुद की उड़ान समझ
लग जाती सच करने में
क्युकी स्त्री हूं मैं….!!

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