कैसे हो तुम?

ज़िन्दगी तूने दिखाए है हर रंग मुझको,
कुछ अपने कुछ पराए एहसास कराए है मुझको,
ठगी सी खड़ी हूं आज,ज़िन्दगी के उस चौराहे पर,
जहा तुमने बोला था के थोड़ा रुकना अच्छे वक़्त के आने तक,
बसंत आकर चला गया,पर फूल कुछ खिले नहीं,
आहत मन मेरा यही कही खोया रहा।
गर्मी के आने पर सोचा कुछ अच्छा आएगा,
पर यह क्या सूरज की रोशनी में सब धूमिल होगया।
सावन की फुहार लाई एक आस,हर एक बूंद से शायद बुझ जाती मन की प्यास,
सावन आया झूम कर बरस कर चला गया, पर उस सावन की हरियाली में भी नहीं मिला कुछ खास।
शरद पूर्णिमा की रात को चांद के नीचे जब मन विचलित हुआ तो सोच में डूब कर फिर रास्ता तुम्हारा देखा।
साल पूरा बीत गया सिर्फ इसी सोच में के आएगा वक़्त हमारा इटलाने को,
पर निराशा ही हाथ लगी मेरे,
मन में रह गई सिर्फ इतनी बात के
“ए ज़िन्दगी अब जब भी मिलो,तो ये मत पूछना के – कैसे हो तुम?”

                                  निवि।

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