सोचा ना था सोचा ना…

“सोचा ना था”
सोचा ना था कभी
ऐसा कलयुग आएगा
घरों में अपने कैद रहेंगे
दुश्मन जहां बन जाएगा
मुंह पर कपड़ा बांध कर
घर से निकला जाएगा
चारों तरफ़ होगा सन्नाटा
मिलने कोई न आएगा
अपने भी ना होंगे अपने
गैर भी आंख बचाएगा
हाहाक़ार मचेगा जग में
चैन ना कोई पाएगा
मौत भी आएगी चुपके से
बच ना कोई पाएगा
ना देगा कोई विदाई
ना कोई नहलाएगा
सोचा ना था कभी …
ऐसा कलयुग आएगा
श्रवण राही
(घर पर रहे कोरोना से बचें)

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