एक समसामयिक बनारसी कविता

गजबै रजा विकास होत हौ
बिन पढ़लै सब पास होत हौ
येहर कोरोना ओहर कोरोना
अदमी जीयतै लास होत हौ
मन्दिर मस्ज़िद बन्द पड़ल हौ
घर बैठल अरदास होत हौ
गेरुवा अउर धानी में जमके
टीवी पर बकवास होत हौ
पपुवा बोलै उछर उछर के
देश क सत्यानास होत हौ
अर्थ व्यवस्था देश क झंडू
गपुवा कहे विकास होत हौ
चीन क टँगरी एक दिन टूटी
अबहीं त अभ्यास होत हौ
एक क सउदा बिकै चार में
ई धन्धा बिन्दास होत हौ
गल्ली गल्ली जमके राजा
जुवा लूडो तास होत हौ
चौचक राजा अच्छे दिन क
जनता के एहसास होत हौ
सच क चेहरा एकदम उतरल
झुठठन पर विस्वास होत हौ.

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