शब्द थे…

जब जीवन के अर्थ निरर्थक हुए थे,
तन्हाइयां पसरी हुई थी उपवन में
सन्नाटों का शोर उद्वेलित करता था
अंत की चाह यदा-कदा
लालसा बनकर उभर आती थी ,
शब्द थे
पर कलम की स्याही सूखी हुई थी
भोर के गगन की लालिमा ढकी हुई थी
स्याह श्यामल बादलों से
ना आशा की कोई गुंजाइश थी
ना सुनहरे कल के प्रति कोई उत्साह
बस! लगभग यही वह समय था
जब आगमन हुआ था
मेरे जीवन में तुम्हारे प्रेम का
कितना निष्ठुर था
तुम्हारा यौवन
झूठे दर्प से अभिमानित पाषाण संवेदनाएँ
खामोश लबों से झलकता हुआ गुरूर
अभिमानित आत्ममुग्ध सौंदर्य
तुम टूटना नहीं चाहती थी
और,
मैं प्रेम की लहरों से
तो कभी शब्दों के अर्ध्य से
प्रतिबद्ध था
तुम्हे तोड़ने के लिए
लगभग !
यही वह समय था
जब आगमन हुआ था
मेरे जीवन में तुम्हारे प्रेम का
शब्द बनते, बिगड़ते
बिगड़-बिगड़कर संवरते
खरीदता रहा बेहिसाब वक्त खर्च कर
तुम्हारे प्रेम की पूंजी को शब्दों के साथ
धीरे-धीरे कलम की स्याह सारथी बन
जीतने लगी हताशा के उस रण को
और शब्द आकार लेने लगे
आज तुम नहीं
पर शब्दों का छोटा सा संसार है
मेरे पास तुम्हारी बदौलत
बस! लगभग यही वह समय था …

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