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जिक्र जहाँ में सबका आया
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जिक्र जहाँ में सबका आया,
पर किसान कभी याद न आया।
कभी अभिनेता तो कभी नेता आया,
पर किसान कभी याद न आया।
!!१!!
जब लम्बी- लम्बी कारों का,
महफ़िल सजी बहारों का।
ऊँची- ऊँची इमारतों का,
वो मुस्कान भरी शरारतों का।
नहीं आया जिक्र सिर्फ किसान का,
धरती के पूज्य भगवान का।
जिक्र जहाँ में सबका आया।
पर किसान कभी याद न आया।।
!!२!!
अायी संकट की घड़ी जब,
अन्न में भीड़ उमड़ पड़ी तब।
खुला छत नंगे पाँव वाला
निर्धन किसान वह गांव वाला,
पसीने से तरबतर माथ वाला,
गोबर से सना हुआ हाथ वाला।
चैन कहाँ है कब वह पाया,
दुख सुख करके जन्म बिताया।
जिक्र जहाँ में सबका आया,
पर किसान कभी याद न आया।
!!३!!
बंद हुए जब सारे धंधे,
सब उद्योग पड़े जब मंदे।
करना मुश्किल हुआ गुजारा,
सबका बना किसान सहारा।
फल अनाज सब्जी पहुँचाया,
फिर भी है वह कब सुख पाया।
जिक्र जहाँ में सबका आया,
पर किसान कभी याद न आया।।

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