कविता

विधा-कविता
“ किताबी जिंदगी”

“किताबो की जिंदगी
पृष्ठों में पल रही हैं
नंबरो से हैं पलटती
पृष्ठों की हर एक संख्या
कभी रंगो में तो कभी
लाइनों में है पिसती
कभी तवज्जो तो
कभी तजुर्बों से
नोटबुक में नोट होती
कभी झटपट पलट जाती
तो कभी घंटो ठहरी रहती
कभी आंखे मात्र देखती
तो मस्तिष्क विचार करता
कभी सहमती तो असहमति से
पृष्ठों में देखी जाती
कभी उत्सुकता
तो कभी मायूसी से सन्नाटा बुनती
पढ़ने की चाहत में
हर बार पलटी जाती
ज्ञान पाने की आशा ले
डिग्रियों में है दिखती
शेष रह जाते हैं
तब भी कुछ पृष्ठ
वो पृष्ठ ही शायद!
किताबी जिंदगी हैं।”

लेखिका– रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश।

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