दिशाहीन

लगता है तुम मस्ती में जहर
घोलकर पिये जा रहे हो।।

अपने अस्त्रों को कही
भस्मासुर को तो नही दिये जा रहे हो।

तुम्हारे ढलते हुये चेहरे से
साँझ बेचैन हुये जा रही है।

अपने हिस्से का सूरज कही
अँधेरे को तो नही दिये जा रहे हो।

पाँव के छालों से बेपरवाह
यूँ ही बस चलते जा रहे हो।।

अपने हिस्से की जुराबें कही
कांटो को तो नही पहनाये जा रहे हो।।

बेरंगी चादर ओढ़े अक्सर
कुहासे से लड़े चले जा रहे हो।

अपने हिस्से के रंगीन सपने कही
बेनूर काजल को तो नही दिये जा रहे हो।।

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