jeevanpath

2000jyoti

टूट कर मन डाल से
अब चल दिया अपनी डगर
कल से अकेला है सफर
कुछ लड़खड़ाती चाल से
पथ पर निकलना है मगर.
अब शांत बिन्दु फकीर से
हम लौट आए हैं इधर
ऐ जुस्तजू करना जिगर
हम जुगनुओं की लाट से
ना नजर आएंगे किधर.
बन मोम कुछ पाषाण से
जीवन का झेला है ज्वर
ना जाएंगे हम हो afar
अब चांद सूरज एक से
हैं मुकद्दर से बेख़बर.
क्या पाया क्यू सोचूँ उसे
Setha न ले दे दर b दर
में हारा नहीं अब भी मगर
उस सिंह वाली चाल से
चलता रहूंगा पथ पर.

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