बन सका वो मेरी जिंदग…

बन सका वो मेरी जिंदगी भी नहीं
हो सका वो कभी अजनबी भी नहीं,

है उजाला सभी ओर पर देखिये
है दिये के तले रौशनी भी नहीं,

तुम हमारे कभी यार हो ना सके
पर कभी खत्म ये आशिक़ी भी नहीं,

है अमावस फ़क़त जिंदगी में मेरी
मिल सकी हमको यह चांदनी भी नहीं,

आँख से एक दरिया तो बहता रहा
मिट सकी पर मेरी तिशनगी भी नहीं,

जान जाता अगर आग ही आग है
प्यार करता कोई आदमी भी नहीं,

रौब अपना किसी को दिखा ना सके
काम आई मगर सादगी भी नहीं—–संजीव कुमार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *