अव्वल-ए-इश्क़ यार कच्…

अव्वल-ए-इश्क़ यार कच्चा था
तजरबा हाँ मगर वो अच्छा था

उसका मेरा मिज़ाज इक सा था
उन दिनो दिल हमारा बच्चा था

अब जिरह है तमाम बातों पे
पहले हर बात पे भरोसा था

रंग दो ही थे इश्क़ के साहब
हिज्र पहला तो वस्ल दूजा था

रोज़ कहते थे शेर जिस पर हम
वो ग़ज़ल थी ग़ज़ल सा लहजा था

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *