फूल कुछ इस तरह तोड़ो…

फूल कुछ इस तरह तोड़ो ऐ बाग़बाँ,
शाख़ हिलने न पाए न आवाज़ हो,
वर्ना गुलशन पे रौनक़ न फिर आएगी,
दिल अगर हर कली का दहल जाएगा !!

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