किसान की ज्योती

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अंधकार पर निज ज्योती सी
महनत की जो ज्योती सी
विश्वास अटूट बंधन उसका
अल्प विराम मे न रूकता
खेत खलिहान नीज प्राण उसके
इतनी उसकी आलोचना है
साथ भी सूर्य चाँद देते
अवास भी उसकी धरा है
भोजन भी उसकी धरा है
अंधकार पर निज ज्योती सी
महनत की जो ज्योती सी
किसान इस धरा पर
ममता की गांठ बाँध देता है

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