जिंदगी की रफ्तार में…

जिंदगी की रफ्तार में
सब बिछड़ते चले गए
घरों पर मंजिल दर मंजिल
बनते चले गए
अब तो ये मंजिल
चढ़ने का हौंसला भी
न रहा बाकी
बेहतर था
मैं जो जमीं पर था

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