लाश.. हाथों की लकीरे…

लाश..
हाथों की लकीरें क्या कहती है?
कुछ है या यू ही बेवजह सी है?
अगर कुछ है तो क्या?
अगर कुछ नहीं तो क्यों नहीं?
जब भी दिल को लगता कि अब ज़िन्दगी की गाड़ी पटरी पर है,
तभी कोई अपना सा ठोंकर मार गिरा देता है l
आस पास के सारे लोग हॅसते है मुझे पर, ठहाके मार !!
मैं भी हॅस देती हूँ, क्योंकि मेरे रोने से इन्हे और हसीं आएगी l
जी चाहता है, इन लकीरों को मिटा दूँ l
मन करता है, दिल खोलकर रो लूँ l
पर कर नहीं पाती कुछ भी….
आस धीरे धीरे मेरे अंदर मर रही है l
कही अब रोशनी नहीं देख पा रही हूँ l
खुद को किसी मकड़ी के जाल मे देखती हूँ l
ये जाल मेरे अपनों ने बुने है और ये सब दरवाजे मेरे ही लोगों ने बंद किये है l
अब हाथों से कलम भी छूट रही है,
अब कागज़ का एक ही टुकड़ा बच पाया है,
अब खुद को लाश बनाने की तैयारी है,
अब ज़ुबा पर ताला लगाने की बारी है l

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