मुझे ज़मीं की गहराईय…

मुझे ज़मीं की गहराईयों ने दाब लिया,
मैं चाहता था मेरे सर पे आसमान रहे…

अब अपने बीच मरासिम नहीं, अदावत है,
मगर ये बात हमारे ही दरम्यान रहे….

वो एक सवाल है, फिर उस का सामना होगा,
दुआ करो कि सलामत मेरी ज़बान रहे….

सफ़र की हद है वहाँ तक कि कुछ निशान रहे
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे…

ये क्या, उठाये क़दम, और आ गई मन्ज़िल,
मज़ा तो जब है, कि पैरों में कुछ थकान रहे…

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