कुछ रिश्ते हमें चुनत…

कुछ रिश्ते हमें चुनते हैं
और कुछ रिश्तों को हम चुन लेते हैं
पर कुछ रिश्ते घुसपैठी होते हैं
वो हमारे भीतर घर करते जाते हैं
और हमें पता भी नहीं चलता

कुछ लोग इस कदर
हमारी शख्सियत का हिस्सा बन जाते हैं
कि उनके बिना सब कुछ अधूरा हो जाता है

कुछ बहते पानी से रिश्ते
सुबह की चाय की पहली चुस्की की तरह ताज़े रिश्ते
दिलों पर बारिश की पहली फुहार से पड़ते भिगोते रिश्ते
और जबरन ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुके ज़िद्दी रिश्ते

रिश्तों की भीड़ भाड़ में एक ज़रूरी रिश्ते का,
घंटों बेवजह बेमतलब बड़बड़ करने वाले रिश्ते का
न होना
हंसती खिलखिलाती दर ओ दीवार को बिलकुल बेजान बना जाता है
शामें बेगानी, चाय फीकी और दरवाज़े की घंटी मायूस रहती है।
नींद से जबरन जगा देने वाले ऐसे रिश्ते
आपके वजूद पर हक़ जताते चलते हैं और हमें ये हक़ देने में नाज़ होता है।

इन रिश्तों के पाँव नहीं होते। ये बस बहते रहते हैं झरने की तरह । लगातार, बेहिसाब और पूरी शिद्दत से। इतना कि आपको तर ब तर कर जाएँ और उसकी चमक सुबह की रौशनी की तरह चारों ओर जगमगाती हुई फ़ैल जाये। जिनका कोई व्याकरण नहीं होता। जो किसी छंद में नहीं समाते। जिन पर कविता लिखने बैठो तो वो कहानी बन जाते हैं।
वो ख़ास रिश्ता जो आपमें ये भरोसा जगा जाए कि जब दुनिया में हमारा नाम ओ निशान नहीं होगा तब भी किसी की आँखें रोज़ आपके लिए जगेंगी , छलकेंगी और दुनिया की खूबसूरती को आपकी नज़रों से जिएंगी। उसी शिद्दत से, भरपूर शिद्दत से।

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