ना जाने कब खो जाऐं …

ना जाने
कब खो जाऐं ये पल
ना जाने कि
कब बच्चे बड़े हो जाऐं

मैं झिडकती ही रह जाऊँ
और
वो सब कुछ झिड़क कर
घर से निकल जाऐं

आज झिडकती हूँ कि
रखो सारा सामान
तरतीब से
कल तरसूँ कि
काश आ कर वो
सब कुछ बिखेर जाऐं

ये करो ये ना करो,
आज देती हूँ हिदायत
कल सोचूं
जो करो सो करो
बस ज़ोर से
मेरे गले लग जाओ

फिर
क्यों ना उन्हें आज ही
जी लेने दूँ ज़िंदगी
चाहे घर ही पूरा
क्यों ना उलट पुलट जाए

इसी बहाने
मैं भी जी लूँगी ज़िंदगी
दिल शायद फिर दिल से जीना सीख जाए

जो अधूरी सी शैतानियाँ मचल रही हैं अंदर कहीं
वो भी बाहर आने का शायद कोई रास्ता पा जाएँ

जब हंसू तो
दिल खोल कर
रोऊँ तो शोर कर
हर एक को बता आऊँ

आधे मुड़े तुडे जो ख़्वाब
ज़िन्दा दफ़्न हैं शरीर में
वो भी शायद ताज़ी साँस ले ज़िन्दा हो जाऐं

मैं भी बन जाऊँ बच्चा अपने बच्चों के साथ
इससे पहले कि वो
बड़े हो जाऐं…..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *