किन किन निगाहों से द…

किन किन निगाहों से दो चार होना पड़ता है,
औरत को ताउम्र ही अखबार होना पड़ता है।

कभी माँ कभी बहिन कभी पत्नी कभी बेटी,
एक चेहरे में कितने ही किरदार होना पड़ता है।

और अपने हिस्से में थोडा सा सुकूं पाने को,
एक औरत को पहले बीमार होना पड़ता है।

एक घर में हो नींव का पत्थर जैसे,
उसको सब सहने को तैयार होना पड़ता है।

लब खामोश मगर उम्र बोला करती है,
एक औरत को कितना जिम्मेदार होना पड़ता है।

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