ना जाने क्यूँ अजीब सी है ये ज़िन्दगी

ना जानें क्यूँ अजीब सी है ये ज़िन्दगी
एक पल में है कोई, तो दूसरे पल में कोई नहीं.
मैं तो हूँ यहाँ… पर मेरा मन है और कहीं
ना जाने क्यूँ अजीब सी है ये ज़िन्दगी.
हर एक पल कुछ गँवाया तो दूसरे हीं पल कुछ नया पाया
कभी कोई रूठा हमसे, तो कभी किसी ने हमें मनाया.
कभी जिंदगी ने हमें रुलाया, तो कभी इसने हमें हंसाया.
ना जाने क्यूँ अजीब सी है ये ज़िन्दगी.
बहुत से रिश्ते दिए.. इसने माँ की ममता, पिता का प्यार
दादी की कहानी तो दादा का दुलार.
कभी किसी ने अपनाया तो कभी किसी ने झटके से हाथ छुड़ाया.
ना जाने क्यूँ अजीब सी है ये ज़िन्दगी.
कभी ज़ोर से गिराया तो कभी हौसले से ऊपर उठाया.
कभी थोड़ा फीका सा तो कभी थोड़ा मीठा सा बनाया.
कभी किसी परीक्षा में फेल तो कभी किसी परीक्षा में पास कराया.
पर हर एक परीक्षा से इसने हमें बहुत कुछ सिखाया.
भले ही हुए कभी फेल पर हमेशा इसने ज्ञान का सागर बढ़ाया.
हर एक परिश्रम से कुछ नया हीं सिखाया.
ना जाने क्यूँ अजीब सी है ज़िन्दगी
एक पल में है कोई और दूसरे पल में कोई नहीं.
एक पल में है कोई और दूसरे पल में कोई नहीं.

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