राह का भी कुछ लुत्फ …

राह का भी कुछ लुत्फ उठा
जिन्दगी की रफ्तार कम कर दे

मंजिल पर पहुंचना जरूरी है मगर
हो सके तो जुनून कुछ कम कर दे

अपने आप से इतना मायूस न हो
अपने आप पर जुल्म कम कर दे

इश्क़ में सनम को खुदा समझ
सनम से शिकायतें कम कर दे

इतनी सी दुआ है मालिक से हरदम ‘मनोज’
इनसानियत को इनसान का हमदम कर दे

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