मेरी ज़िंदगी के चिरा…

मेरी ज़िंदगी के चिराग़ का ये अन्दाज़ कोई नया नहीं,
कभी रोशनी कभी तीरगी, ना जला हुआ न बुझा हुआ,
मुझे आप क्यूँ न समझ सके, पूछिए दिल से
मेरी दास्ताँ ए हक़ीक़त का हर वरक़ खुला हुआ!

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