सुनो ज़िक्र है कई सा…

सुनो ज़िक्र है कई साल का कि किया इक आप ने वअ’दा था

सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो

कहा मैं ने बात वो कोठे की मिरे दिल से साफ़ उतर गई

तो कहा कि जाने मिरी बला तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो बिगड़ना वस्ल की रात का वो न मानना किसी बात का

वो नहीं नहीं की हर आन अदा तुम्हें याद हो कि न याद हो

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