तुम अपने गम गिनाओ, मैं तुमको हसाता हु।।

तुम कुछ अपनी बताओ,मैं अपनी सुनता हूं।।
तुम अपने गम गिनाओ, मैं तुमको हसाता हु।।

दर्द मेरे भी कम नही, मैं भी मजबूरिया छुपाता हु।।
कुछ अपनो से बात करके, मुठ्ठी भर सुकून लाता हु।।

कुछ यादों भरे नगमे, मैं गाता ओर गुनगुनाता हु।।
तुम अपने गम गिनाओ, मैं तुमको हसाता हु।।

हर साल हर बार,गनपती …

हर साल हर बार,गनपती जी को लाते है।
छप्पन भोग लगाते है, रोज सेवा आरती गाते है।
११ दिन घर सजातेहै।,बडे मजे आते है।
फिर ़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़
फिर क्या फिर हो हल्लामचाते है।
फिर घर से बाहर फेंक आते है।
श्रृद्धा के नाम पर ढकोसला निभाते है।
जरा सोचो , अपने बच्चे को कोई ऐसे फेंक आता है।
फिर किसने हमे हक दिया , कि किसी के बेटे को फेक आने का।
अब सोचे कोन किसके बेटे को ़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़ंंंंं़़़़़़़़़़
रेखा विवेक शर्मा।