बड़ी कुशहाल थी …

बड़ी खुशहाल थी जिंदगी
फिर हमे भी प्यार हो गया
अच्छा खासा चल रहा था
अब बद से बदहाल हो गया

                             कवि:श्रवण चौधरी"राही"

सनम

न तुझसे कोई खुशी
न तुझसे कोई गम
बीत गए वह दिन
जब आशिक तेरे थे हम
अब न मैं तेरा जानू
न ही तू मेरी सनम
हो जाऊंगा दूर
जहां ले जाए करम
मैंने तुझको अपना समझा
हर घड़ी हरदम
पर तेरी मैं समझ न आया
जैसे कोई भरम
न तुझसे अब कोई खुशी
न तुझसे कोई गम…

             कवि: श्रवण चौधरी"राही"

सच्चाई

एक दिन न तू होगा
न तेरी हस्ती होगी
किसी कोने में
पड़ी तेरी अस्ति होगी
न रुपया न पैसा
न ही तेरी गिरस्ती होगी
जिस भ्रम में तू
जिया जिंदगी
दो कौड़ी से भी सस्ती होगी
याद न होगा
तेरी शोहरत किसी को
हृदय में बस
तेरी स्वस्ति होगी
अब भी है वक्त
मोहमाया से दूर हो जा
आधी उम्र मैं मैं में गुजरी
अब आधी जनसेवा में लगा
एक दिन न तू होगा
न तेरी हस्ती होगी

                कवि:श्रवण चौधरी "राही"

नेताजी सुभाष चन्द्र…

नेताजी “सुभाष चन्द्र बोस”

तुम मुझे खून दो
मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा
अंग्रेजों के जुर्म का
गिन गिनकर बदला लूंगा
माना बड़ी है उनकी सेना
उन्हें भगाकर है दम लेना
हम भी कहां किसी से कम
उनसे ज्यादा हम में है दम
आजाद हिन्द के हम मतवाले
जीते जी न हारनेवाले
अन्तिम सांस लड़ेंगे उनसे
चाहे लहू बदन से बरसे
वीरों की फौज बनाई
नेताजी ने कि अगुवाई
अंग्रेजों को खूब छकाए
कभी पकड़ उनके न आए
राष्ट्र रहेगा सदा ऋणी,
पाकर सपूत तुम जैसा गुणी

                 कवि:श्रवण चौधरी"राही"

माना वक्त खराब है दि…

माना वक्त खराब है
दिल में उमड़ा सैलाब है
दूर हटेगा जब अंधियारा
पूरे होंगे जो ख्वाब है
गिरना भी है उठना भी है
उठकर आगे बढ़ना भी है
एक दिन चमकेगी किस्मत अपनी
माना गर्दिश में आज है
बजेगा अपने नाम का डंका
नहीं है इसमें तनिक भी शंका
वह भी करेंगे हमसे प्यार
जिनको है हमसे तकरार
माना वक्त खराब है
दिल में उमड़ा सैलाब है

                कवि:श्रवण चौधरी"राही"

कुछ लोग आज खुशि…

आज फिर न जाने कितने जश्न मनाएंगे
नए साल के स्वागत में डीजे बजाएंगे
रंगबिरंगे पकवानों को ताव देकर खाएंगे
और कुछ बेचारे आज भी एक रोटी को लालचाएंगे
कूड़े में पड़ी पत्तल से भूख को मिटाएंगे
टूटी हुई झोपडी के फर्श पर सो जायेंगे…..

                            कवि:श्रवण चौधरी"राही"

ऊपरवाले ने भी बड़ी फ…

ऊपरवाले ने भी बड़ी फुरसत से तुम्हे बनाया
चहरे पर मुस्कान दिया नयनों को खूब सजाया
सूरत दे लाखों में एक हृदय में प्रेम बसाया
मन पावन गंगा सा दिया वाणी से मुग्ध कराया
अपनेपन का क्या कहना गैरों को भी गले लगाया
लाख सहे चाहे दर्द जहां से आंखों में अश्रु न आया
बगिया में खिली एक गुल कि तरह खुशबू से उसे महकाया
नटखट भी गुड़िया की तरह तुझे देख के मन हर्षाया
आशीष रहे तुझ पर ही सदा कभी गम की न आए साया
ऊपरवाले ने भी बड़ी फुरसत से तुम्हे बनाया

                                       कवि:श्रवण चौधरी

ठिठुरती काली रात में…

ठिठुरती काली रात में
अत्यंत दयनीय हालात में
हक के लिए अपने अडे हुए
प्रशासन से भी लड़े हुए
घर बार छोड़कर सड़कों पर
गीले कपड़ों में पड़े हुए
गांधी के दिखलाए पथ पर
भारत के हलधर चले चले
फिर भी कुछ मतिहीन लाचार
कर रहे उन्ही पर अत्याचार
लगा कलंक मेरे कृषक पर
कर दिया मान को तार तार
अरे नादानों यह मत भूलो
ऋण को उनके पैसों से न तोलो
उनके बिन कैसे जीवन होगा
कैसे होगा जीवन का अभियान

                      कवि:श्रवण चौधरी"राही"

जिसने भरा देश का पेट…

जिसने भरा देश का पेट
जहां में लाया क्रांति श्वेत
ठंड धूप में लगे रहा
रात रातभर जगे रहा
खेतों को बेटों सा पाला
अपने मुख का त्याग निवाला
कभी नहीं लेता है छुट्टी
बांटे अन्न खोलकर मुट्ठी
फिर भी मिले ना कोई लाभ
सभी योजना लागे ख्वाब
खेत छोड़ वह सड़क पर आए
अपनी मांग को शोर मचाए
जूं ना रेंगे किसी कान पर
कुचल रहे सब इनके स्वर
हाय रे मेरे हिन्द का किसान
इनकी सुने न एक दीवान

                     कवि:श्रवण चौधरी"राही"