वो रात दर्द और सितम …

वो रात दर्द और सितम की रात होगी,
जिस रात रुखसत उनकी बारात होगी,
उठ जाता हु मैं ये सोचकर नींद से अक्सर,
के एक गैर की बाहों में मेरी सारी कायनात होगी

शाम-ए-फ़िराक़ अब न प…

शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई

बज़्म-ए-ख़याल में तिरे हुस्न की शम्अ जल गई
दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई

जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी
जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई

दिल से तो हर मोआ’मला कर के चले थे साफ़ हम
कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई

आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र ‘फ़ैज़’ न जाने क्या हुए
रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई

चलो आज फिर उन्ही पुर…

चलो आज फिर उन्ही पुरानी गलियों से गुज़रते है

जहाँ कुछ सपने संजोये थे कभी, जहाँ कुछ अपने रहते कभी
सपने पूरे हुए पर अपने कहीं खो गए
उन्ही अपनो को ढूँढ उनसे गुफ्तगु करते है
चलो आज फिर उन्ही पुरानी गलियों से गुज़रते है

दोस्तों के साथ हर घडी रुठने मनाने का चलन था
खेलने से ज़्यादा हमेशा लडने का मन था
उन्ही लडाईयों मे खोया हुआ अपनापन ढूँढते हैं
चलो आज फिर से उन्ही पुरानी गलियों से गुज़रते है

घर लौटते हुए रास्ते मे कई जगह रुक जाया करते थे
कभी चाट तो क भी बर्फ के गोलों का लुफ्त उठाया करते थे
उसी भूले हुए स्वाद को फिर से ताज़ा करते है
चलो आज फिर से उन्ही पुरानी गलियों से गुज़रते है

ज़िन्दगी कुछ यूँ आगे बढ़ी की पीछे बहुत कुछ छूट गया
कहने को तो बडे हो गए, पर अभी तक बचपना नही गया
बचपन की यादों मे बसे दोस्तों को ढूँढ़ने निकलते है
चलो आज फिर से उन्ही पुरानी गलियों से गुज़रते है….

अजीब रिश्ता हैं मेरा…

अजीब रिश्ता हैं मेरा ऊपर वाले के साथ
जब भी मुसीबत आती हैं
न जाने किस रूप मे आता हैं
हाथ पकड़ कर पार लगा देता हैं
मैं उसके सामने सर झुकाता हूँ
वो सबके के सामने मेरा सर उठाता हैं

वजह

खनकती सी हंसी उनकी, तराने कुछ सुनाती है
और उनकी ख़ुश मिज़ाजी ही, हमें हर ग़म भुलाती है
अब उनसे इश्क़ करने की, वजह ना पूछना हमसे
क़सीदे सुन सुन कर उनके, वजह भी मुस्कुराती है

Glossary
Qaseede: poetry written in praise

किनारा

सिफ़ारिश दिल की थी या कुछ, किया किस्मत ने इशारा था
यूँ ही जब महफ़िल में हमने, तुम्हें छुप छुप के निहारा था
मिलीं थीं नज़रें जब तुमसे, हुआ था इश्क़ यूँ कामिल
कुआँ प्यासे को और जैसे, मिला क़श्ती को किनारा था

Glossary
Kaamil: complete, perfect

कल न बदला वो आज बदले…

कल न बदला वो आज बदलेगा,
वक़्त अपना मिज़ाज बदलेगा।

आदमी की यहाँ तलाश करो,
आदमी ही समाज बदलेगा।

फूल माला बने रहे जो तुम,
कैसे काँटों का ताज बदलेगा।

वो जो ख़ुद को बदल नहीं सकता,
वो भला क्या रिवाज बदलेगा

गुलाब हाथ में हो आँख…

गुलाब हाथ में हो आँख में सितारा हो
कोई वजूद मोहब्बत का इस्ति’आरा हो !!

कभी-कभार उसे देख लें कहीं मिल लें
ये कब कहा था कि वो ख़ुश-बदन हमारा हो!