अब के सावन में ये शर…

अब के सावन में ये शरारत मेरे साथ हुई,
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई

आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुजरी?
था लुटेरों का जहाँ गाँव वहीं रात हुई

ज़िंदगी-भर तो हुई गुफ़्तगू गैरों से मगर,
आज तक हमसे न हमारी मुलाक़ात हुई

हर गलत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझको,
एक आवाज़ जब से तेरी मेरे साथ हुई

मैंने सोचा कि मेरे देश की हालत क्या है,
एक कातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई

क़ातिल तुम्हें पुकार…

क़ातिल तुम्हें पुकारूँ, के जान-ए-वफ़ा कहूँ
हैरत में पड़ गया हूँ, के मैं तुमको क्या कहूँ
ज़माना है तुम्हारा, चाहे जिसकी ज़िंदगी ले लो
अगर मेरा कहा मानो तो ऐसे खेल न खेलो
तुम्हारी इस शरारत से, न जाने किसकी मौत आए
ज़रा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक न जाए
मज़ा जब है तुम्हारी हर अदा क़ातिल ही कहलाए

शेखर जीने की आरज़ू…

‘शेखर’ जीने की आरज़ू में
क्यूँ तिल तिल यूँ मर रहे हो
लम्हों में क़ैद ये ज़िंदगी
क्यूँ सदियों में जी रहे हो

नफ़रत का बाज़ार न बन…

नफ़रत का बाज़ार न बन।
फूल खिला तलवार न बन,
रिश्ता रिश्ता लिख मंजिल।
रस्ता बन दिवार न बन,
कुछ लोगों से बेर भी ले।
दुनिया भरका यार न बन,
अपना दर ही दार लगे।
इतना दुनियादार न बन,
सब की अपनी साँसे है।
सब का दावेदार न बन,
कौन ख़रीदेगा तुझको।
उर्दू का अख़बार न बन,