स्पस्टीकरण

मैं एक अंतहीन यात्रा
की ओर अग्रसर हो रहा हूँ
मेरी यात्रा काफी लंबे होने की संभावना है
मैं जानता हूँ
तुम पूछोगे की तुम कहाँ जाओगे
कहीं हिमालय की तराइयों में पहुँच
साधु या सन्यासी तो नहीं बन जाओगे
हम जानते हैं अनेकानेक प्रश्न तुम उठाओगे
ओर सहमता भी हूँ तुम उस
अंतहीन यात्रा का
स्पस्टीकरण न पूछ बैठो ।।।

ग़ज़ल

ये गज़ल हुई
या वो गजल हुई
मिलने को मिले
फिर वो बिछड़ गयी
हादसों पर हादसे
होते चले गए
गम के सागर में
हम डूब गए
जिंदा अभी हैं
मरे हम नहीं
ये ग़ज़ल हुई
या वो गज़ल हुई ।

आगाज़

वो भी आगाज़ था ये भी आगाज है ।

जीवन एक प्यास है
जीवन ही आस है
जीवन अगर है
तो सबको विश्वास है ।

हर पल उम्मीद है
पल पल की सांस है
हर इंसान को ईश्वर ने
बनाया ही कुछ खास है ।

इंसान होता भी वैसे खुद में
कुछ खास है ।
किसी की वो चाहत है
तो किसी का विश्वास है ।

हँसना भी फितरत है
रोने का भी एहसास है
कोई प्रसन्न है
तो कोई उदास है

जीने का अपना , अपना
ही अंदाज है ।
वो भी आगाज़ था ,
औऱ ये भी आगाज है ।
स्वरचित ।

कारोबार

खून खून सब एक है
ब्राह्मण भूमिहार चमार
अपराधी के संरक्षण का
बन्द करो कारोबार ।।।

मौत औऱ व्यपार

उसकी मौत भी अब व्यपार है
कई राज दब गए
पूछने का किसे अधिकार है
दुष्टों को जाना है एक न इक दिन
बहाना कुछ भी हो
उसे ये भी स्वीकार है
उसे वो भी स्वीकार है ।
हर युग मे रावण आएगा
जमकर आतंक मचाएगा
बहुतो की जान पहले लेगा
अंत मे खुद भी ये मिट जाएगा ।
जय महाकाल ।
हर हर महादेब ।

जज्बात

नही समझना है आसान
मेरे दिल के जज्बातों को
न समझे हो न समझोगे
आप मेरे नेक इरादों को ।

जय महाकाल हर हर महादेब

अपराधी किस तरह बेख़ौफ होते है
गलत करके भी वो महफूज होतें है
सिस्टम का तानाबाना उसे हिला नहीं सकता
उसे फक्र है खुद पर उसे कोई मिटा नहीं सकता

ये खुद को काफी इज्जतदार बताते है
बड़े सम्पर्को का ये जाल बनाते हैं
महाकाल के शरण मे जाकर भी ये
खुद को नहीं ये बचा पाते है ।

जय महाकाल
हर हर महादेब
महादेब को नमन
महाकाल का दर्शन ।

इजहार प्यार का

तुमसे इजहार प्यार का
करने से डर रहा हूँ मैं,
तुम नहीँ जानती अपने आप से

कितना लड़ रहा हूँ मैं ।

प्रेम

पाना नहीं है प्रेम
देना भी प्रेम है
तेरे प्रेम में राधा
मोहन आज मौन है ।