शेखर जीने की आरज़ू…

‘शेखर’ जीने की आरज़ू में
क्यूँ तिल तिल यूँ मर रहे हो
लम्हों में क़ैद ये ज़िंदगी
क्यूँ सदियों में जी रहे हो

गुमनाम सा ये दर्द भल…

गुमनाम सा ये दर्द भला, गुज़र क्यूँ नहीं जाता
सहर तो रोज़ होती है, उजाला फिर क्यूँ नहीं आता
बहार तो है चमन में, वीराना फिर क्यूँ नहीं जाता
रूबरू हो दिल के तुम, करार फिर क्यूँ नहीं आता

वक़्त की धारा अविरल…

वक़्त की धारा अविरल है, तुम ख़ुद को लय में बहने दो
हर दर्द दवा बन जायेगा, बस दिल को रौशन रहने दो
राग द्वेष सब मिट जायेगा, ज़रा प्रेम का अमृत घुलने दो
रात की स्याही ढल जायेगी, बस सुबह का सूरज उगने दो

शेखर हर शख़्स के द…

‘शेखर’ हर शख़्स के दिल में
कहीं इक दर्द छुपा होता है
तेरा अश्क़ों से बयान होता है
मेरा तबस्सुम में छुपा होता है

इतने क़रीब हो, फिर …

इतने क़रीब हो, फिर भी ये दिल उदास है
तेरे विसाल में क्यूँ, जुदाई का एहसास है
’शेखर’ तेरे लफ़्ज़ों में तो वफ़ा का शोर है, फिर
तेरी आँखों में क्यूँ, बेवफ़ाई का आभास है