पतवार छोड़ो…पाल खोल…

पतवार छोड़ो…पाल खोलो
हवाएं ले जायेजिधर..तुम हवाओं क़े सहारे
उस तरफ चल पड़ो….
अब ये मांझीका कौन अहसान उठाएं
अच्छा होगा लंगर भी तोड़ दो किश्ती भी”उस “पर छोड़दो
अब ये जिधऱ ले जाए तुमहे
अगर मझधार मे डुबो दे तो वही किनारा है क्योंकि
अब डूबना भी तुम्हारा उबरना है

कितना साफ सरल सा …

कितना साफ सरल सा रस्ता है
न दिवार कीटेक है न किसी शाख का साया है
न किसी आँख की नजर न किसी आदमी कीआहट है
अब अच्छा होगा तुम्हारे लिए
अपनी तन्हाई लीए चलते रहो
वैसे भीनकोई साथआएगा तुम्हारे न कोई साथ चलनेवालाहै

रूह एक बार जलेगी तो…

रूह एक बार जलेगी
तो वो कुंदन होंगी
क्या देखीहै कभी रूह?
उसे कभी महसूस किया है?

जीवंत जागते हुए
दूधिया कोहरे से लिपट कर
क्या सांस लेते हुए इस कोहरे को
कभी महसूस किया है?

कुछ भी नही था पास ज़…

कुछ भी नही था पास ज़ब मै इस बस्तीमे आयाथा
मुझे उस बात का मलाल नही कि मेरे पास आज भी कुछ नही हैँ

गमो क़े बाजार मे गम तों आज भी महंगा बिक रहा हैँ
खूब बिकते हैँ यहां गम यहां पर इनकी कीमत कम.कभी होती नहीं हैँ

कहीं कहीं आज भी दिख …

कहीं कहीं
आज भी दिख जाते हैँ भलाई और करुंणा क़े
कारनामे.फुटपाथों पर
कही कही आज भी होते हैँ चर्चे धर्म
और फर्ज़ क़े गाँव की चौपालों पर

ज़ो स्त्रीचार दिन मे…

ज़ो स्त्रीचार दिन मे थोकरूप से परेशान हों लेती हैँ
पुरुष तीस दिन मे फुटकर रूप से परेशान रहताहैँ
इसिलए पुरुष की पीड़ा कभी इतनी प्रगाढ़ नही दिखती
जितनी स्त्री की दिखती हैँ
और पुरुष की प्रफुलता भी उतनी सौहार्द पूर्ण नही दिखती
जितनी स्त्री की दिखती हैँ

लगताहैँ अभी अभी कुछ…

लगताहैँ अभी अभी कुछ होगा
जल्दीकुछहोगा
थोड़ी देऱ और टिके रहो
कौन जाने कल हीं वो नियति का दिन हों
ज़ब तुम पर सौभाग्यकी वर्षा हों
छप्पर टूटे
कौन जाने कल तक और रुक लो तो
शायद तुम एक दिन जीने का और भी देख लो .